Wednesday, August 15, 2012

मेरा भारत मेरी शान


"गायन्ति देवाः किलगीतिकानि ध्यानास्तुते भारत भूमि भागः !

स्वर्गापवर्गास्पद हेतु भूतः, भवन्ति भूयः सकला पुरुष्तात !!"





भारत-भूमि पर जन्म लेने के लिए देवता भी लालायित रहते हैं ! हम शब्दोपाषक स्वतंत्रता दिवस के शुभ-अवसर पर माँ भारती से यही प्रार्थना करते हैं कि हमारा हर जन्म भारत में ही हो !!

Sunday, May 8, 2011

माँ


माँ स्नेह का अल्हड़ जलप्रपात हैं
माँ कभी निष्ठुर प्रस्तर समान हैं
माँ 'सोमाद्रि' के जीवन का संगीत हैं
माँ नाद में विराजमान शक्ति-पीठ हैं

संसार क़ी रचयिता माँ-शक्ति को समर्पित

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माँ हो सकता है मैं तुम सा ना बन पाऊं,
तुम कोई शिकायत ना करना ,
पर जब भी पास आऊं
मुझे गले से जरुर लगा लेना ,
बाहर बहुत झंझावात है
और अंदर कई द्वन्द हैं
लेकिन तेरी ममता के आँचल तले
सारे ना जाने कैसे हो जाते बंद हैं
शक्ति क़ी प्रतिनिधि जननी-माँ को समर्पित

Thursday, May 5, 2011

अब्दुला दीवाना

बहुत दिन बीते
मैं नींद में खोई थी
ना जागी थी और ना मैं सोई थी
कितनों को देखा मैंने,
पलकों के अधर तले
पर ना पाया मैंने अपने जो संग चले
बहुत दिन बीते
मैं खील-खील हो रोई थी
न जाने किस बगिया में सोई थी



दिन बीते रात बीते
हवाओं के साथ रीते
कोपलें फूट चुकी कब क़ी
न जाने क्यों मैं खोई थी
तंद्रा थी ऐसी जो
मुझे कुरेदती गई
आसमां से जमीं तक टोहती रही
लेकर क्या है जाना,
सारा ·कुछ है बेगाना
उसके इस शहर में तुम भी हो
अब्दुला दीवाना
बहुत दिन बीते
मैं नींद में ही खोई थी
पर थोड़ी-थोड़ी जागी थी और
थोड़ी-थोड़ी सोई थी....

Friday, October 8, 2010

परम सत्ता को नमन !


मेरे बंधू ने एक प्यारी सी ई-मेल भेजी थी, जिस के चित्रों ने कहानी कही है, आप भी उस शक्ति को नमन करें, नवरात्रों क़ी शुभकामनायें.....

....पर मेरी एक बात पर भी गौर कर लें...


नवरातों में नौ दिनों तक हम ब्रह्मांड को संभालने वाली परम सत्ता की अराधना में लगे रहते हैं, क्या इन नौ दिनों में हम 'उस परम सत्ता के बारे में क्षण भर के लिए भी सोचते हैं जिसने हमारे जीवन के ब्रह्मांड को संभाल रखा है, सजा रखा है अपने आंचल से।

वो आंचल जो कभी छुटपन में हमारे मुख पर लगे जूठन को साफ कर देता था, आज भी कभी खाने की थाली पर मक्खी भिनभिनाने लगे, तो वही आंचल उसे भगाने के लिए आगे जाता है।


जिसका आंचल हमें सारी विपदों से बचाता है, हम उस परम सत्ता की अराधना नहीं करते, हम करते हैं पत्थरों पर बसने वाली परम शक्ति का, पर जिस हांड़-मांस की पुतली 'मां ने हमें पहला घर दिया है,

उसकी अवहेलना... क्यों?

क्या घर में बसी मातृसत्ता उस परम सत्ता से अलग है या कमतर है।

क्या सोच कर उस सत्ता को तकलीफ देते हैं?


क्या हम उस सत्ता से भी खुद को बड़ा आंकने लगे हैं?

हम किस दुश्मनी का बदला ले रहे है?

अगर वो सत्ता न होती तो आज हम अशरीरी कहीं भटक रहे होते.. कभी इसकी छत , तो कभी उसके बुर्ज

साल मेरे दो बार नवरातें आतीं हैं, तब तो गला-पहाड़ कर माँ के जयकारें
लगाते हैं...और घर की देवी को रुलाते हैं



ये याद भी नहीं रखते क़ि सारे कर्ज चुक जायेंगे, मातृ-कर्ज कैसे चुकायेंगे ?

... और मौन होकर ऐसे निर्णय ले लेते हैं जिनसे हमें भी सुख नहीं मिलता..

उस परम सत्ता की वजह ही आज हमारा वजूद कायम है ... वर्ना इस सुंदर संसार का
उपभोग करने वालों में हमारा नामो-निशान न होता



उस परम पुंज के अंश को अँधेरे में रख कर हम कौन सा प्रकाश पा लेते हैं ?


इतना कुछ करने के बाद भी वो दयामयी ही बनी रहती हैं


क्या हम इन नौ दिनों में कम से कम एक दिन तो अपनी मातृसत्ता की पूजा-अर्चना करने का वक्त निकाल ही सकते हैं?





एक दिन ठीक उसी तरह उस जीवित सत्ता के चरणों में बैठ कर अर्चना करना, जैसे क़ि नवरात्रों में निर्जीव तस्वीर के आगे भीख मांगते हो, पुष्पों से माँ को लादते हो ....

कर के देखना.. जिंदगी का नजरिया बदल जाए...





और यकीनन जिदंगी खूबसूरत हो उठेगी।







Friday, October 1, 2010

यूही उन्हें महानायक नहीं कहा जाता....




कुछ बात तो है.. वरना उन्हें लोग महानायक क्यों कहेंगे। मैं यहां बात कर रही हूं द लेजेंड अमिताभ बच्चन की। इस बार ऑफिस के सिलसिले में मुंबई जाना पड़ा, वैसे मुझे भेजा इसीलिए गया था ताकि करोड़पति बनने के गुर सीख कर लौट सकूं। जब सिखाने वाले स्वयं बिग बी होंं, तो मुर्दा भी इंकार कैसे कर सकता है, फिर मैं तो जीवित हूं। ये उनसे मेरी तीसरी मुलाकात थी, पर इस मुलाकात ने मुझे समझाया कि सुपरस्टार जैसे घर में दिखते हैं, पहते हैं और अपने दायित्व के लिए सतर्क हैं, वैसे ही वे स्टेज पर होते हैं।
कौन बनेगा करोड़पति २०१० की लॉन्ंिचंग का कार्यक्रम मुंबई के जे डब्यू मैरियट में रखा गया था और जैसा कि हर बार होता है.. बिग बी के प्रवेश पर पत्रकार भी सीटियों और तालियां से स्वागत करते हैं और दूसरी ओर से आवाज आती है.... नमस्कार मेरा नाम अमिताभ बच्चन है....हाउ स्वीट ना....
गौर करने की बात है कि उनके नाम से हर कोई परिचित है फिर भी वे अपनी परिचय मुस्कुराते हुए, हाथ जोड़कर देते हैं,.. यकीन नहीं होता, जो करोडो़ं लोगों के दिलों में राज करता है, उसे परिचय देने की क्या जरूरत? पर बिग बी का यह स्टाइल है...वे रिन्यू कर देते हैं अपने चाहने वालों के कोटर, जहां वे विराजते हैं... कि मैं वहीं हूं, जिसे आप के दुलार ने महानायक बनाया है।

ये शुरुआती मिसाल है, पर जब वे स्टेज से जाते हैं, तो भी कुछ ऐसा कर जाते हैं, जो आपके दिल पर गहरी छाप छोड़ दे...।
कार्यक्रम में अमिताभ ने कौन बनेगा करोड़पति २०१० की बुक का अनावरण भी किया (चित्र देखें) इसके लिए उन्होंने किताब पर चढ़ा रैपर फाड़ा और नीचे की तरफ आहिस्ते से सरका दिया, इसे आप फैंकना नहीं कहेंगे...और जब प्रोग्राम खत्म किया, तो अपने फैंके हुए उसी रैपर को उन्होंने बिनी तक्कलुफ के उठाया और साथ ले गए, जबकि वहां आयाजकों के बिग हैंड्स भी थे, उन्होंने भी अपनी किताबों के रैफर फाड़ कर यूं ही स्टेज पर फैंके थे...।
बस एक छोटी सी अदा हम सबको सिखा गई कि स्वच्छता भगवान के सामिप्य ले जाती है... यानि cleanliness is next to godliness.
और महानायक आप तभी हो सकते हैं, जिसने भगवान को पाने के लिए अपने दायित्व ईमानदारी से निभाए हो...