Wednesday, July 29, 2009

यादों के झरोखों से

जिंदगी में आपका सामना किस के साथ हो जाये,
ये आप और हम नहीं जान पाते है..इनमे से कुछ मुलाकातें तो यादगार बन जाती है और उस व्यक्तित्व के बारे में रह-रह कर याद दिलाती हैं, ऐसी ही एक हस्ती से मेरी मुलाक़ात अनायास हुई थी, मैं उनकी सुन्दरता और मुस्कराहट पे अभिभूत थी. .. जिसे हम सभी ने एक सुंदर जीवित प्रतिमा के रूप में देखा था कभी,
एक लम्हा वो भी आया उस सुन्दर काया को पञ्च-तत्व में विलीन करता गया
आग की दहकती लपटों को मैंने गाते हुए महसूस किया -एक दिन वो आएगा माटी के मोल..जग में रह जायेंगे प्यारे तेरे बोल...ये गीत कितना सच है . दुनिया में कुछ भी नहीं रहता है, रह जाते हैं तो सिर्फ आपके मीठे बोल ...

इस गाने के शब्दों में कितनी सच्ची बात है कि हम
और आपको एक दिन इसी माटी में मिल जाना है.. पर कौन सोचता है. हम तो अपनी जवानी को अपनों के बीच काट लेते है और बुढापे को एकेले के साथ बिताने को मजबूर होते है, चाहे अरबों कि जागीर क्यों न हो पास.. महारानी गायत्री देवी भी इसके अपवाद नहीं रही

आएये में ले चलूँ आपको मेरे यादों के झरोखों में जहाँ जयपुर की पूर्व राजमाता से मेरी मुलाकातें हुई थी ...
दो बार मुलाकात हुई, दोनों ही संक्षिप्त, क्योंकि दोनों ही बार मैं अपने असाइनमेंट पर थी। एक मुलाकात कोलकाता में हुई थी, जहां मुझे दैनिक विश्वमित्र ने सेलिब्रिटी रिपोर्टर बनाकर भेज दिया था।
मुझे त्रिपुरा के पूर्व महाराजा की बेटी की गुपचुप शादी को कवर करना था। गनीमत है कि उस दिन मेरा मूवी देखने का प्लान था। जब चीफ रिपोर्टर प्रदीप शुक्ला का फोन आया और उन्होंने इतना ही कहा था कि तुम हो कहां? मैंने बड़े निश्छल भाव से कहा-हाजरा रोड में हूं। बस प्रदीप भाई बोले-इमिडिएटली त्रिपुरा हाउस जाओ..मैने खींझ कर कहा-पर क्यों?प्रदीप जी-वहां एक शादी है, मीडिया को एंट्री नहीं है, आप को सेलिब्रिटी न्यूज को मसौदा रेडीहै। खैर, मैंने जैसे-तैसे अपने फ्रैंड को मनायाकरना और सीधे त्रिपुराभवन(प्रोमतेष बरुआ सरणी) जा पहुंची। मुझे इतना भान था कि यहां किले की तरह घेरा-बंदी होगी ..



मेरे पास लैटर-पैड था, छोटी वाली कलम(फेवरेट) इतेफ्फाक से मैंने उसी दिन रिकॉर्डर खरीदा था, जो पर्स में था।
अब बारी आई कि एंट्री कैसे
लूं हाउस में...खैर दिमाग की बत्ती ने साथ दिया और फूलवाली बन कर मैने हाउस मेंएंट्री पा ली..फिर शुरू हुआ खोज-बीन का दौर..किसी को पहचानती नहीं थी। मुझे कभी भी राजे-रजवाडों की जीवनी पढने में रूचि नहीं रही है. इवेंट कवर करने पे लग रहा था काश ये सारे चेहरे मेरे परिचित होते
जिधर नज़र घूमती वही झलकते जाम दिख जाते, धुयाँ से लबरेज गॉसिप करती सुंदर सुंदर महिलायों का हुजूम नज़र आता ..और कहीं पे तो नवाबी ठाठ दिखाते गोरे-गोरे चिट्टे-चिट्टे पूर्व महाराजा बाते करते नज़र आते .....मैंने अपना काम जारी... बीच बीच में लज़ीज़ पकवानों की खेरियत भी ले आती , करीब ती घंटों में रिकॉर्ड में फ्रंट पेजस्टोरी का मसौदा इकट्ठा हो गया, तब तक शाम भी घिर आई..मैं बस निकले को ही थी, देखा एक्ट्रेस मुनमुन सेन, भरत देववर्मन( महारानी गायत्री देवी की बहन के बेटे) और रिया सेन किसी से हंस-हंस कर बात करते दिखे..मुझे एक बार तो लगा कि चेहरा जाना पहचाना है, पर कहां देखा ये बात याद नहीं रही थी
सहसा याद आया पापा की स्क्रैप बुक में एक खूबसूरत महिला की फोटो-कलेक्शन में से कुछ मेल खाती है। माइ गॉड! ये तो गायत्री देवी है- चार्मिंग प्रिंसेज... मैं तो उनकी बातों को सुनने के साथ कहां खो गई..ध्यान ही रहा..मुनमुनदी क्रिमसन रैड साड़ी में थी और पूर्व
राजमाता ऑफ जयपुर लाइट ब्लू साड़ी, उनके गले में पर्ल नैकलेस था और चेहरे पर अद्भुत मुस्कान।

वे इस कदर घिरी थी अन्य रियासतों के लोगों से कि मुझे उन तक पहुंचने
का मौका नहीं मिल रहा था, दूसरी वीडियो-रिकॉडिग वाले बार-बार लाइट इस तरह फोकस कर रहे थे कि मेरी आंखें चुधिया रही थी।...पर मैंने अवसर निकाल ही लिया और पूर्व राजमाता गायत्री देवी से बहुत ही संक्षिप्त मुलाकात की..मैं उनके सौन्दर्य से अभिभूत थी... लेकिन उनकी आंखों ने मेरे एटिट्यूड से पहचान लिया था कि मैं कौन हूं। नाम बताने के बाद उन्होंने सहज रूप से पूछ लिया-सो यू आर हेयर फॉर सेलिब्रिटी न्यूज..मैं मुस्काराई ..और तभी मोबाइल घनघना उठा...ये मेरी पहली मुलाकात थी पूर्व राजमाता गायत्री देवी के साथ
सन 2004 में...दूसरी मुलाकात भी इसी तरह अनायास हुई, 2008 में वो भी उनके अपने शहर जयपुर में। मैं किसी काम से जवाहर कला केन्द्र गई थी, राजमाता वहां आर्ट इनागोरेशन के लिए आई थीं। फर्क इतना था कि वे इस बार व्हील चेयर पर थी, मीडिया की भीड़ के हुजूम में थी, फिर भी उन्होंने मुझे पहचान लिया था। मैं उनकी स्थिति को देखकर शॉक्ड थी..उनकी मुस्कुराहट का उत्तर भी दे पाई थी।

मैंने उनकी स्थिति से यही जाना-आपको प्रकृति ने कितना ही सुंदर क्यों बनाया हो, पर समय के साथ-साथ शरीर जीर्ण होता जाता है।
मात्र चार सालों में गायत्री देवी की चार्म में तो चेहरे पर दिख रही थी, पर आंखों में कुछ और ही बात थी..बेबसी. एकाकीपन.. उस सुंदर-प्रतिमा का एक पुजारी हमारे घर में है और वो हैं मेरे पापा। या यूं कहूं कि पापा उनके बहुत बड़े फैन
थे। उनके बारे में किसी भी नेशनल-इंटरनेशनल मैग्जीन में कुछ भी छपता, वे उसे बड़े चाव से पढ़ते थे और उनआर्टिकल को सहेज कर रखते थे।

1967 की बात है। कोलकाता टर्फ क्लब (रेस कोर्स) में इंविटेशन कप हो रहा था और पापा अपने प्रिय घोड़े midnight cowboy पर दाव लगाने गए थे। इस घोड़े ने कई बड़े कप जीते थे। ये घोड़ा भी महारानी गायत्री देवी की नैहर से संबंधित था। महाराजा नारायन ऑफ कूचबिहार के ऐसे कई घोड़े थे, जिन्होंने रेस में धूम मचाई, midnight cow
boy´ उनमें से एक था। यही उन्होंने पहली बार महारानी गायत्री देवी को महारानी जीना नारायन ऑफ कूचबिहार के साथ देखा था। जीना रानी एक स्कॉटिश महिला
थी, उनका भाई रिकाबी कूचबिहार महाराजा के रस के घोडों का जोकी था.. रिकाबी ने ही पापा का परिचय गायत्री देवी से कराया था गायत्री देवी ने उस दिन नीले रंग की साड़ी पहनी थी। दुनिया की सबसे खूबसूरत महिलाओं में से शुमार के लिए पापा बस इतना ही कहते हैं- She was God sent कुछ लोग अलौकिक व्यक्तित्व के धनी होते हैं। संसार में आते हैं, बड़े कामों को अंजाम देते हैं और दुनिया उन्हें आइकॉन की तरह पूजती है, पर एक दिन नियत समय पर अपने बेशुमार दौलत और अकेलेपन को छोड़ कर सदा-सदा के लिए पंच-तत्व में विलीन हो जाते हैं। पूर्व राजमाता गायत्री देवी का जीवन भी कुछ ऐसा रहा। शी लिव्ड लाइक किंग।

वो बेमिशाल थीं, अद्वितीय रहीं और यादों के झरोखों में रहेंगी एक खूबसूरत इतिहास बनकर

गीत कितना सच है . दुनिया में कुछ भी नहीं रहता है, रह जाते हैं तो सिर्फ आपके मीठे बोल ...