Wednesday, April 15, 2009

जिस्म आ गया, दिल रह गया

कोलकाता से लौट तो आयी,
पर दिल मेरा वहीँ रह गया
उन किताबों में जो
धूल की चादर लपेटे मेरा इंतज़ार
करती रही पल पल
कहीं मीर उल्टे पड़े थे,

कहीं ग़ालिब को टेक लगाना पड़ा था

अगर कोई हँसता था मुझे देख कर

वह था अलमारी में विराजमान

तोल्स्तोय का संसार
गोर्की भी इसी पनाहगार में आनंद से थे,
कोई तकलीफ में था तो

वह मेरा रंगों का पोतला,
जिसकी बूंदों से कैनवास रंगीन बन जाता था,
मेरे भीतर का सृजक कभी देवी सूक्त,
तो कभी विज्ञानं की दुनिया सजाता था

और वो नोट बुक वैसी ही पड़ी है,
जिनमे समेटा है कुछ धुनों का जादू,
जिसने हर मोड़ पर मुझे न होने दिया बेकाबू

अब भी बहुत कुछ है उस कोने में ,
जो मेरा हमसाया हुआ करता था
हर रुदन में वो दोस्त की तरह
समझाया-बुझाया करता था
लौट तो आये पिंक सिटी में,
मगर जिस्म आ गया, दिल रह गया

Monday, April 13, 2009

घुन भी गुनगुनाते हैं !

घुन भी गुनगुनाते हैं ! चुम्बन के बाद तमाचा मारते हैं क्यूंकि
इस दिल को क्या पता ?
कब किस पे आ जाये
इस दिल को क्या पता !
कब किस पे आ जाये
न तेरे पास न मेरे पास
न मेरे पास न तेरे पास
रहे न कोई ...........
कुछ लोग तो इसी तरह गुनगुनाते हुए आगे बढ़ जाते हैं..ऐसा तो उन्हें धुन लग जाने के कारण ही होता है। भई हो भी क्यों न...ये उनकी फितरत है। अब देखिए, मुझे ताज्जुब तो तब हुआ, जब संदीप ने धुन के कमेंट बॉक्स (4 अप्रैल) में लिखा था-
धुन और घुन में ज्यादा अंतर नहीं...दोनों आबाद कम बर्बाद ज्यादा करते हैं...
बड़े मजे की बात है, मेरे पुरुष-मित्र इससे सहमत नहीं हैं। वे तो धुन की धूनी में रमे रहने में ही मर्दानगी समझते हैं। अब बात रही घुन की, तो वे इस कंसेप्ट से परहेज रखते हैं कि अपना शरीर तो अनाज का कोठार है। मानें भी कैसे? धूनी का धुआं उन्हें कुछ देखने थोडे़ ही देता है। पर दिखता तो उन्हें है, जो धन और घुन दोनों को परख लेते हैं।
अब बात रही धूनी की, तो बता दूं कि महिलाएं भी कम नहीं हैं किसी को घुन बनाने में। किसी पर आक्षेप नहीं है ये, पर जब अपने आसपास नजर दौड़ाती हूं, तो मेरी बटन जैसी आंखें बड़ी होने लगती हैं। कानों के परदे पर सारी हलचलें सुनाई देने लगती हैं कि ऑफिस में किसका किससे क्या कांटा भिड़ा है। कभी-कभी बहुत कोफ्त होती है कि कोई किसी के गाल पर चुम्बन दे कर उन्हीं गालों पर तमाचा भी रसीद कर सकता है। ऐसा वास्तव में अप्रासंगिक लगता है किसी कन्या के लिए, क्योंकि कन्याएं तहजीब की देवी मानी जाती हैं। प्रेम और स्नेह लुटाने वाली, घर को स्वर्ग बनाने वाली मानी जाती है, पर जब वे ही ऑफिस में देवी के उस चोले को शिकस्त देती है, तो लगता है, ऑफिस, कोई ऑफिस नहीं, बल्कि प्रेमागार बन गया है, और ऑफिस का बंदा उनके लिए खिलौना। उन कन्याओं के लिए ऑफिस का डेकोरम चला जाता है भाड़ में, उसकी जगह जन्म ले लेती है पेज-3 की दुनिया के विस्फोटक किरदार, जिन्हें इमोशनल अत्याचार करने में मजा आता है।यानी मजा का मजा और एक्स्ट्रा माइलेज (कवरेज, डेस्क से लेकर मैनेजमेंट तक)साथ-साथ। कितनी गजब की सोच है? क्यों सही कहा ना...सोम-रस जैसे ब्लॉग पर इस तरह की पोस्ट डालने का औचित्य समझ में नहीं आएगा मेरे सुधि पाठकों को, पर ये गतिविधियां मेरे स्त्री होने पर प्रश्न करती है कि नारी का जन्म बबाद करने के लिए नहीं हुआ है। वो मुझे प्रेरणा देती है कि जिस तरह चिरकुमारी रहकर देवी सूक्त की रचयिता एक महिला ऋषि वाक् ने की थी और तत्कालीक ऋग्वैदिक सभी ऋषियों में अपनी श्रेष्ठता अर्जित की थी, पर आज इस तरह के उदाहरण सोचना भी बेबुनियाद है। आज की नारी किसी से हारी है, तो अपने तन से, मन से और धर्म से...क्योंकि उसने झूठे गम को मिटाने का तरीका सीख लिया है। एक के बाद एक शिकार करना सीख लिया और आशा भौंसले की तरह गुनगुनाए जा रही हैं..
.तौबा तौबा,
क्या होगा, होना है जो वो होगा।
होता है जो हो जाने दो
आने वाला आएगा ,
जाने वाला जाएजा
तुम ना मानो, तो जाने दो...
मतलब पहले प्यार से चुम्बन, फिर प्यार से तमाचा दिल पे

Wednesday, April 1, 2009

धुन

कुछ दिनों से एक व्यक्ति को नाप-तोल रही हूं, कहने का मतलब मैं उसका आकलन कर रही हूं, क्योंकि व्यक्ति बड़ा सुरीला है। उसका सुर वादी स्वर से समवादी स्वर में ढलता जा रहा है। मगर कभी-कभी मुझे जनाब का यह व्यवहार विवादी स्वर की तरह कानों में गूंजने लगता है।अब आप सोच रहे होंगे कि मेरा दिमाग खराब हो गया है, उमर होती जा रही है, तो सठियाने लगी है अभी से..
पर ये तो सच है कि उमर के साथ अनुभव की गठरी भी भारी होने लगती है..यकीन मानिए, जब किसी के ग्रे मैटर में कोई टैग टिपक जाता है, तो दिमाग के लाउडस्पीकर में एक ही गाना गूंजता है


चला जाता हूं किसी की धुन में

धड़कते दिल के तराने लिए...
मिलन की मस्ती भरी आँखों में,

हजारों सपने सुहाने लिए...



हम जिंदगी के किसी किसी मोड़ पर ऐसी धुन जरुर गुनगुनाते हुए चलते है...हम इससे बचना चाहें या चाहें, किसी भी स्टेटस से ताल्लुक रखते हों, पर हमारे दिल के फ्रेम में वो इस कदर समा जाता है कि हम उसके आकर्षण में बहने लगते है।
अंजाने में दिल की धड़कन उसके नाम से अपनी रफ्तार बढ़ा देती है और हमारे कदम उस शख्स की एक झलक पाने के लिए उसी ओर चल पड़ते हैं, जहां उसका आना-जाना लगा रहता है, उठना-बैठना होता है। हमारी अंगुलिया बेहिचक मोबाइल पर उन्हीं नम्बरों को डायल करने लगती है, जो लोग उस शख्स के आस-पास होते हैं। और दिमाग उसकी हर गतिविधि को ट्रेक करने लगता है..ये जानते हुए कि उसका हमारी जिंदगी में क्या वास्ता है? हो सकता है कि दिल कहे कि प्यार हो गया है और हम जाम के नशे में उन्हें अनायास ही फोन कर यही बात कहने की कोशिश कर जाते हैं

की तुम वो हो, जिसे दिल ने बहुत ऊंचा स्थान दिया है,

तुम वो हो, जिसके लिए मेरा दिल कुछ करना चाहता है,

तुम वो हो, जिससे मेरी वेवलैंथ मिलती है

तुम वो हो, जिसके साथ कुछ पल गुजारना चाहता हूं...

पर तुम हो कौन?

ये और कोई नहीं वही धुन है, जो किसी के जीवन में दबे पांव आती है, बिना दस्तक दिए..मगर उसका आना अपने आप में कमाल होता है..उसके आने से दिमाग के सोचने का नजरिया बदलने लगता है, उसकी एक झलक की कौंध से अंदर का रचनाकार जाग उठता है..जो गुनगुनाने पर मजबूर करता है..
वह धुन ही प्रेरणा है। बस यही वजह होती है, जब हम चाहते हुए भी अपनी जान को हथेली में रखकर रफ्तार से बातें करने लगते हैं..दिमाग भी धुन में मस्त होकर गाने लगता है

एक मुलाकात जरूरी है सनम
आपको अहसास होने लगता है कि एक धुन से लाइफ कितनी मेलोडियस बन सकती है। यानी एक ही धुन जरुरी है आगे बदने के लिए, ये रचनाकार को मोटिवेट करने लगती हैपर कभी सोचा है उस धुन को भी तकलीफ होती है जब रचनाकार की स्वर लहरी विवादी स्वर में बदल जाती है...
धुन रफ्तार देती है जीने का, सलीका देती है कुछ बेहतर देने का, मगर जब धुन हाइवे पर तेज गाड़ी चलाने को मजबूर करे, तो समझ लो खतरा है..आप ट्रेक से आउट हो रहे है
ये आपके हाथ में है कि किस धुन पर आप आपना कमाल दिखायेंगे

है ना कमाल की बात यानि एक धुन से चाहो तो रचनाकार बन जाओ..और ना चाहो तो बर्बाद हो जाओ ....