Monday, March 23, 2009

धूप के सिक्के

धूप के सिक्के
धूप के सिक्के उठा कर गुनगुनाने दो उसे
बैंगनी कंचे हथेली पर सजाने दो उसे
भोली भाली भोली भाली भोली भाली रहने दो
ज़िन्दगी को ज़िन्दगी को
ज़िन्दगी को बहने दो

बारूद जब बच्चा था वो तितली पकड़ता था
वो अम्बिया भी चुराता था
पतंगों पर झगड़ता था
अगर तुम उसका मंजा लूटते वो कुछ नहीं कहता
थोडा नाराज़ तो होता मगर फिर भी
वो खुश रहता
मगर धोके से तुमने उसका बचपन भी
तो लूटा है
ज़रा देखो तोह उसकी आँख में वो कबसे रूठा है
जुगनुओं की रौशनी में दिल लगाने दो उसे
धूप के सिक्के उठा कर गुनगुनाने दो उसे

बैंगनी कंचे हथेली पर सजाने दो उसे
भोली भाली भोली भाली भोली भाली रहने दो
ज़िन्दगी को ज़िन्दगी को ज़िन्दगी को बहने दो

बहुत जल्दी दुपट्टे ओढ़ना सिखला रहे हैं हम क्यों ज़िन्दगी को रात से मिलवा रहे हैं हम
वो पल्लू से चिपक कर माँ के चलती थी तो अच्छी थी
अकेला छोड़ कर उसको क्या कहना चाह रहे हैं हम
एक गहरी नींद से हमको जगाने दो उसे
धूप के सिक्के उठा कर गुनगुनाने दो उसे

बैंगनी कंचे हथेली पर सजाने दो उसे
भोली भाली भोली भाली भोली भाली रहने दो
ज़िन्दगी को ज़िन्दगी को ज़िन्दगी को बहने दो

(पियूष झा की फ़िल्म सिकंदर देखने के बाद प्रसून जोशी ने प्रेरित होकर इस गीत को लिखा है )
प्रसून के शब्दों ने मेरे अंदर हलचल मचा दी है। इन शब्दों ने मुझे उन यादों की तरफ ढेल दिया, जिसमें हिस्सा में भय भी है। कोलकाता जैसे साम्प्रदायिक प्रीति वाले शहर में अल्हड़ सा बचपन बिताने वाली एक लड़की इस दिन के बाद खुद को अचानक बड़ी-बड़ी महसूस करने लगी थी। जिसने काकाओं-चचाओं के हाथों से खिलौने-गुब्बारे पतंग लिए थे, उन्हीं के हाथों में खून से सनी नंगी तलवारों और आंखों में स्नेह की जगह खौफ देखा था। ये 6 दिसंबर उस काले इतिहास का हिस्सा तो बना, जिसने एक ऐतिहासिक धरोहर को सदा-सदा के लिए मित्तूई में मिला दिया और पन्नों में सिमटी रह गई बाबरी मस्जिद , मगर मेरे लिए यह तारीख उस बचपन पर कुठाराघात करने वाली बन गई, जिसने मुझमें जाति भेद करना सिखाया, गलती किसी की भी हो , मैं आज भी किसी अन्य मजहब के व्यक्ति से रिश्ता बनाने से पहले खुद को कई बार टटोलती हूं। मेरे अंतर्मन राम और रहीम में बंट गया है। फर्क इतना है कि मैंने अब तक की जिंदगी में जो गुनगुनाना सीखा था, इस पर आतंक के छींटे हैं जो मेरे अंदर की निश्छल लड़की को गुनगुनाने से रोकते हैं। और रह-रह कर याद दिलाने के लिए कलैंडर में ६ दिसंबर आ जाता है। मेरे लिए तो सिर्फ यह ६ दिसंबर है, मगर कश्मीर के मेरे भाइयों-बहनों के लिए कलैंडर का हर दिन ६ दिसंबर होता है। रोज की बारूदी लड़ाइयों में उनकी निश्छलता तार-तार होती है और बचपन अचानक से बड़ा हो जाता है।
काश !
जिंदगी को जिंदगी की तरह कोई बहने देता और हम सभी धूप के सिक्कों से खेलते रहते
जिंदगी को जिंदगी की तरह बहने दो
धूप की चादर में लिपटे रहने दो
रेत में सपनों का घर बनाने दो
खिलखिलाहटों में खो जाने दो


Saturday, March 14, 2009

कालसर्प की जय हो

आजकल मैं राहों में खूब ध्यान से चलती हूं, डरती हूं कि कोई सपोला मिल न जाए। राहों पर ध्यान अधिक देने की बदौलत मेरी आंखें भी आकार में बड़ी होती जा रही हैं। अरे मैं कोई मजाक थोड़े ही न कर रही हूं, भई कुंडली में कालसर्प का योग चल रहा है। अपनी अकल ही ऐसी है, पत्र-पत्रिका में भारत की कुंडली में कालसर्प योग की बात पढ़ने को दिखी, तो मेरे छोटे से दिमाग ने सोच लिया कि भारतवर्ष अपनी माता है, तो माता का दोष तो संतान में प्रवाहित हो ही सकता है। भाई जीन्स के जरिए... अगर नहीं है तो आस-पास का इंवायरमेंट ही कालसर्प दोष से ग्रस्त करने के लिए बहुत है। यही वजह है कि मैं आजकल घबड़ाई-सी उचक-उचक कर राहों में चलती हूं, सोचती हूं कोई सांप-सपोला मेरे पैरो के नीचे आकर चलता बना, तो मेरे सिर कालसर्प का दोष लग जाएगा। और बचाने के लिए आस्तीन के सांप हैं ही, वे किस कदर इस दोष से मुक्त करेंगे, इस कल्पना से ही मेरा दिल कांप उठता है, क्योंकि आस-पास ऐसे कई उदाहरण मेंरे पास हैं। इसी घबड़ाहट और डर का कमाल है कि आंखें बड़ी होती जा रही हैं। एक दिन ऐसी घबड़ाहट में किसी और परिचित के घर जाना था, फोन किसी और लग गया, दोनों ही एक ही एरिया में रहती हैं, तो बातचीत हुई और मैं पहुंच गई अपनी महिला ज्योतिष मित्र के घर। वे ज्योतिष में अच्छी पकड़ रखती हैं। मेरे परेशान चेहरे और उसमें से झांकती बड़ी-बड़ी आंखों को देखकर उन्हें क्या पता चला, ये तो मुझे भी मालूम नहीं, मगर बातों-बातों में उन्होंने कालसर्प योग के साइंटिफिक एस्पैक्ट की चर्चा शुरू की। अब आप ही बताएं कहीं ज्ञान के मोती झर रहे हों, तो कोई बटोरने से क्यों चूके? मैं भी इन मोतियों को लपक-लपक के बटोरने लगी। कोई कितना बड़ा ही मक्कार क्यों न हो, मगर ज्योतिष जैसे विषय पर जानकारी बटोरने से नहीं चूकता है। वहां मैडम बात कालसर्प की कर रही थी। उनकी जानकारियां कमाल की थी..मुझे लगा कि सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी, तो जनता-जनार्दन से इन अच्छी बातों को शेयर किया जाना चाहिए। वैसे भी
हमारे देश के आध्यात्म और सेक्स की जय हो ये दो ऐसे विषय है, जिनको नमक मिर्च मसाला लगा कर आसानी से लोगो के सामने पेश किया जा सकता है और फिर इस ज्ञान से किसी को भी अभिभूत किया जा सकता है.. अब आप सोच रहे होंगे.. ऐसे कौन-से ढोंगी बाबाओं का बैंड बजने वाला है यहाँ
अगर ऐसा विचार मन में आ भी रहा है, तो त्याग दीजिये, क्यूंकि ये सुधरने वाले लोगों में से नहीं है..इस मामले में जनता-जनार्दन को ही अपडेट रहना पड़ेगा
हाँ तो मैडम बता रही थी कि अधिकतर ज्योतिषी महोदय सिर्फ कुंडली देखकर कालसर्प योग के उपस्थित होने का दावा करते हैं और इसके निवारण के लिए अच्छी खासी रकम वसूल लेते हैं? जबकि आप चाहें, तो ग्रहों की डिग्री को खुद ही देखकर इसके होने का अंदाजा लगा सकते हैं। आप चाहें, तो किसी भी ज्योतिषी से इस विषय में उसके अनुभव को परख सकते हैं, क्योंकि आप उपभोक्ता हैं। इस सर्विस प्रोवाइडर के बदले आप उसे कीमत देते हैं।
वास्तव में मैथ्स की दृष्टि से देखें, तो सिर्फ नोड्स को राहु-केतु माना गया है, ये वास्तव में ग्रहों की श्रेणी में नहीं रखे गए हैं। कालसर्प योग में नोड्स(राहू और केतु ) के दायरे में सारे ग्रहों में से एक भी ग्रह राहू और केतु की डिग्री के बाहर चला जाता है, ऐसे में कालसर्प योग खंडित हो जाता है। अगर कोई पंडित इसे छाया कालसर्प कह रहा है, तो समझ लीजिए कि वह अपनी गिरफ्त में आपको करने के लिए आपके माथे में फिजूल का डर भर रहा है।एक अच्छे एस्ट्रोलॉजर की सबसे बड़ी पहचान है कि वह गणित की बुनियाद पर आपके टाइम के घेरे के विषय में आपको संकेत देता है। कालसर्प योग भी उसी टाइम का संकेत देता है कि कब आपकी मेहनत कहां पर कम रिजल्ट देगी ,इस बारे में करीब छह साल पहले एक बनारस के महापंडित ने बताया था कि हम पंडित समाज में आजीविका की वजह से ’ज्योतिष के कुछ सूत्र जान कर बच्चे निवारण करने लगते हैं, जबकि उन्हें ये भी नहीं मालूम होता है कि राहु-केतु की कौन सी पोजिशन एंटी-क्लॉक वाइस कालसर्प बनाएगी और कौन-सी पोजिशन क्लॉक वाइस इस योग का निर्माण करेगी।यानी अगर आप किसी महापंडित के घेरे में आ रहे हैं, तो सावधान हो जाइए, क्योंकि जितना नुकसान आपकी कुंडली का कालसर्प योग नहीं कराएगा, उतना नुकसान वह महाशय करा देगा।
आप समझ गए होंगे वास्तव में क्यों इतना डर-डर के रास्तों में चलती हू मैं
तो अब आपके समझ में आयी कि सोम-रस ब्लॉग पर इस तरह के आर्टिकल को लिखने का मतलब है कि हम अपने आस-पास की घटनायों के प्रति भी जागरूक हों ।
मेरा मानना है जब तक हम छोटी-छोटी बातें नहीं जानेंगे, समझेगे तब तक हमारे अपने भी इसी तरह कालसर्प के चंगुल में फंसकर अपना सुख-चैन खोते रहेंगे
काल यानी समय को सर्प ही माना गया है ये जताने के लिए कि कितने productive है, मूल्यवान है तो समय का सदुपयोग करें, क्यूंकि तो इसका मोल नहीं समझता है वह अपने समय को खुद ही लीलता जाता है और एकदिन ख़तम हो जाता है....बिना कोई उपस्थिति दर्ज किये हुए ...
अब आप ये न सोचें कि किसी का रोजगार ठ़प पड़ जायेगा, ऐसा नहीं गलत को सही करने में हमारी भी भूमिका होनी चाहिए तो कालसर्प की जय हो

Monday, March 2, 2009

रुक जाना नहीं तू कहीं हार के



बचपन तेरा कहीं छूट न जाए
बार-बार यही डर मुझे सताए,


मेरे मन में डर क्यों है, शायद इसलिए कि वक्त के प्रहारों को मैंने बचपन में खूब अच्छी तरह चखा है। फर्क इतना है कि हर प्रहार ने मुझे मजबूत और जिद्दी बनाया। अब इन प्रहारों का असर स्लमडॉग मिलिनेयर के नन्हे अज्जू पर कितना होगा, पता नहीं, शायद फर्श से अर्श तक के सफर में अज्जु को इतना प्यार मिला है कि कहीं वो अपनी प्रारंभिक संघर्ष को भुला न बैठे...उसकी ओस्कारिया सफलता ने बाप का सर घुमा दिया, बाप के अन्दर का अजगर सामने आ गया

ये बहुत ही सामान्य बात है कि लड़की जब अच्छा काम करती है, तो बाप को खुशी होती है, मगर यही काम जब बेटा करता है, तो बाप को अपनी हस्ती बिखरती नजर आती है। अज्जू की रोती आंखों और उसके बाप के खुलेआम रुपए मांगे जाने से ये बात साफ है कि जिंदगी को दास मलूका के शब्दों की चाशनी से नहीं चलाया जा सकता है। अजगर की तरह लोभ और हस्ती को बचाने के लिए जद्दोजहद तेजी से चलने लगती है और इसमें जीत हमेशा हस्ती बचाने वाले की होती है।

फिलहाल इस खेल में दो पात्र हैं एक है नन्हा अज्जू और दूसरा उसका बीमार बाप। अज्जू जैसे किरदारों को स्लमडॉग मिलिनेयर के डायरेक्टर डैनी बॉएल के जीवन की उस घटना से सीख लेनी चाहिए, जिसने उन्होंने अपने बाप के साथ हुई हस्ती की लड़ाई से जीत दिलाई थी।
डैनी बॉएल के घर की स्थिति और सामाजिक परिस्थितियां भी लगभग अज्जू की तरह ही थी, जिस तरह अज्जू के आराम करने की बात पर उसके बाप ने बिफर कर उसे पीटा था, उसी तरह डैनी बॉएल के बाप ने उन्हें शराबियों के सामने गाना नहीं गाने पर खूब पीटा था, तिरस्कार किया था। आज उसी नन्हे तिरस्कृत बच्चे डैनी ने ऑस्कर जीत कर सिद्ध कर दिया कि हस्ती की लड़ाई में वो ही जीत सकता है जो वक्त के प्रहार में हौंसला न खोए और गिरते-पड़ते मेहनत की ढाल बनाकर आगे बढ़ता रहे...

डैनी ने कठिन परिस्थतियों में जीवन जीने के जिस सलीके को खोज निकाला और ऑस्कर विजयी हुए, उसी तरह स्लम के असंख्य अज्जुओं को अपने आस्तिव की लड़ाई में वक्त के प्रहारों को शान से झेलना होगा..

स्लम शब्द केवल गरीबों के वास-स्थान से जुड़ा हो, ऐसा नहीं है अगर हम-आप इसका व्यापक अर्थ खोजने निकलें, तो थक-हार कर चार्ल्स डार्विन के घर पहुंच जाएंगे। जिसने बहुत पहले ही यह सूत्र प्रतिपादित कर दिया था कि आपको जीवित रहने की लड़ाई में सबसे फिट बनना होगा।
अगर ठंडे दिमाग से सोचें, तो अस्तित्व की लड़ाई में हस्ती की लड़ाई नजर आएगी। हम-आप ऐसी भीड़ यानी स्लम में रहते हैं, जहां विचारों को आसमां नहीं मिलता है, मिलेगा कैसे कभी हम उस आसमां को छूने की कोशिश करते हैं..कभी तबियत से एक छोटा-सा पत्थर भी ऊपर उछालने की कोशिश नहीं करते हैं...हमारी आप की तरह डैनी बॉएल ने भी मान लिया होता कि बाप की तरह ही शराबियों को शराब परोसकर रहना है, तो वह भी बाप की तरह खड़ूस और शराबी ही बनता...ऑस्कर लेकर अपनी रचनात्मक क्षमता के परचम नहीं लहरा पाता...
आपको क्या लगता है कि डैनी बॉएल में एक्स्ट्रा आर्डिनरीकुछ है..नहीं बाप से बेहतर बनने की जिद्द ने उन्हें अपने क्षेत्र का सबसे ऊंचा मुकाम दिलवाया....
हम सभी अज्जू की तरह ही अपने-अपने स्लम (कार्य-क्षेत्र) में आंसू बहा रहे है...क्या एक बार मन लगा कर आसमां को छूने की कोशिश करेंगे? किस पर ..भाग्य पर...हमारे ब्रेन में दास मलूका बैठ गए हैं...दास मलूका हमारी कम इच्छा शक्ति की परिचायक है। अवरोध से सभी बचने का प्रयास करते हैं, और जो against the wind sail करते हैं.....
वे अपने स्लम के डॉग (सर्वश्रेष्ठ) बनते हैं।
बचपन ( क्रिएविटी) तेरा छूटे ना,
तेरा रब (मेहनत) तुझसे रूठे ना