Friday, January 30, 2009

Tuesday, January 27, 2009

देश-भक्ति कभी खोएगी नहीं


गणतंत्र की जय हो

जब भी देश-भक्ति की बात होती है, कवि प्रदीप के लिखे अमर गीत की पंक्तियां याद आने लगती है मुझे...

आज के इंसान को ये क्या हो गया?

इसका पुराना प्यार कहां पर खो गया?


मुझे नहीं लगता है कि भारत जैसे देश में लोगों के बीच प्यार खोता जा रहा है, हो सकता है कि हम आतंकवाद, जातिवाद, राष्ट्रवाद और न जाने कितने वाद-विवादों से घिरे थे, घिरे हैं और घिरे रहेंगे, मगर एक बात इन्हीं वाद-विवादों के बीच से हमें एक-दूसरे से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करती है... और वह है तिरंगा....
जिस तरह तिरंगे को लहराता देख मेरा मन एक अजीब से अहसास से झूमने लगता है, उसी तरह हर वो भारतीय आंखें तिरंगे के तीनों रंगों को देख कर शहादत करने वालों को एक बार तो याद करती होगी..उन आंखों के सामने एक बार उन बम-धमाकों के धुएं में चलती-फिरती, भागती-दौड़ती वो तस्वीरें दिखाई देती होंगी, जिन्होंने आतंकवाद के दंश को प्रत्यक्ष झेला है...और वो आंखें भी देशप्रेम से भर जाती होंगी, जिन्होंने मीडिया की नजर से उन्हें देखा है, भले ही ये अप्रत्यक्ष दृश्य हो, मगर इसने भी उतने ही घाव दिए हैं, जितने प्रत्यक्ष साक्ष्य वालों ने लिए हैं....हम भले आतंकवाद के बारे में सोचते हों-

कैसा ये खतरे का फजल है,
आज हवाओं में भी जहर है...



मगर मुझे महसूस होता है कि इस फजल ने भी हमें दिलों से, संवेदनाओं से जोड़कर रखने में मदद की है। जब भी हम अपने जवानों के शरीर पर तिरंगा लिपटा हुआ देखते हैं, उस समय एक बार देश को तहस-नहस करने वालों को मिटाने अपनी मुटि्ठयां भींच लेते हैं। और वो जहरीले लोग यही सोच-सोच कर खुश होते हैं कि इस देश को तो...
डस दिया सारे देश को जहरीले नागों ने, घर को लगा दी आग घर के चिरागों ने...
उन्हें ये सोच कर अंदर ही अंदर मरने दें हम, क्योंकि हम उस देश के वासी हैं जिसने संसार को शून्य दिया है और ये शून्य अपने आप में बहुत घहरा अर्थ समेटे हुए हैं। शून्य यानी ब्रह्माण्ड , हमारे अंदर का ब्रह्माण्ड , हमारे बाहर का ब्रह्माण्ड ... और उस तिरंगे का चक्र(अशोक चक्र) जिसमें एक नही, २४ तिलिया है. ये हमें २४ प्रहार देश-प्रेम की याद दिलाती रहती है वो भी अनजाने में...एक संदेश के जरिये ...

सुनो जरा ओ सुनने वालों,
आसमान पर नजर घुमा लो
एक गगन में करोड़ों तारे,
रहते हैं हिल-मिल कर सारे...


फिर हम क्यों डरते है ऐसी अप्रत्याक्षित बातो से, क्या हम ये सोचते है कि....
किसके सिर इल्जाम धरें हम,
आज कहां फरियाद करें हम,
करते हैं जो आज लड़ाई,
सब के सब हैं अपने ही भाई...


देखिए हर दिल अगर ये फरियाद खुद से कर लें, तो देश-भक्ति कभी खोएगी नहीं, यकींन मानिए यह लहराएगी तिरंगे के रंगों में, जल में, थल में और गगन में ..एक बार फिर से कवि प्रदीप की आत्मा सदा देगी

अपना तो वो देश है भाई,
लाखों बार मुसीबत आई...
इंसानों ने जान गंवाई
पर देश की लाज बचाई॥
हिन्द

Tuesday, January 20, 2009

गुस्ताख दिल



लोग मिलते हैं अजनबियों की तरह,


साथ चलते हैं करीबियों की तरह,


मौका मिलते ही पूछ लेते हैं


क्या साथ रहोगी गर्ल-फ्रेंड की तरह?



ये गुस्ताख दिल की ही जुर्रत हो सकती है, जो हर अजनबी के कंधे की तलाश में मारा-मारा फिरता है। ऐसे ही एक गुस्ताख दिल वाले से मेरा परिचय मीडिया के एक कॉन्फ्रेस में हो गया। जनाब को कंधे की तलाश थी और मुझे टाइम-पास की...टेलीफोनिक-फ्रेंडशिप हो गई। उधर जनाब हर बार मुझे चेता देते कि भई मुझे अपना लो...और मैं थी कमिटमेंट- चिपकू, सो चार कदम बात बढ़ती, तो आठ कदम पीछे लौट आती। अपना सिलसिला यूं ही चलता रहा


मीत(परिवर्तित नाम) मध्यप्रदेश के एक छोटे से शहर में पला-बढ़ा और दिल्ली जैसी महानगरी में सैटल हो गया है, लेकिन महानगरीय संस्कृति भी उसके कुछ गुणों को ढक न सकी थी, जिसकी मैंने बड़ी सख्त झलक हाल में देखी, जब वह जयपुर आया। उससे मिलने लक्ष्मी विलास गई जहां वह ठहरा था, उसने अपनी टीम से मेरा परिचय करवाया, मुझे आश्चर्य हुआ कि लगभग सभी टीम मैम्बर्स मुझे नाम से पहचानते थे। और बातों-बातों में टीम ने उसकी शरारतों का पुलिंदा खोलना शुरू कर दिया, मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं उसकी लोकल गार्जियन हूं। मगर मैं मीत को समझती हूं, वो करें भी क्या उसके पास भी तो एक दिल है जो टाइम मिलते ही गुस्ताखियां कर बैठता है।
टीम से मिलने के बाद दोनों काफी देर तक कॉफी शॉप में बैठे थे,ठंड भी थी और अपनी पुरानी बातों से माहौल भी गर्म होता रहा। हम जब भी बातें करने बैठते हैं, करेंट टॉपिक से लेकर कंट्रोवर्सयल टॉपिक की बखिया उधेड़ लेते हैं। इस बार की बातें पार्टनर, लिव-इन-रिलेशन्स, सेक्स, रीति-रिवाजों और मर्दानगी पर फोकस रही...मीत की बातें सुनकर मैं इतनी खो गई कि मुझे समय का ध्यान ही न रहा..भई वह बातें ही कुछ ऐसी कर रहा था। जुर्रत करने वाले की बॉय इमेज से वह एक संवेदनशील नागरिक के रूप में बदल गया था। महिलाओं के बारे में, उनके हितों के बारे में, बच्चों के दायित्व के बारे में, रिलेशनशिप के बारे में उसकी सोच बिल्कुल बदली हुई नजर आई। रुदिवादी विचार-धाराओं को हर हालत में नकारने वाले तथ्य बताता रहा। उसका कहना-लड़की है उसे जीने का हक है, माता-पिता क्यों संस्कृति के नाम पर उस पर रीति-रिवाजों को थोपते हैं। क्या विवाहित होने पर सिंदूर लगाना जरूरी है, ताकि दुनिया देखे कि वह सिर्फ एक मर्द की जागीर हैं। क्या उसे अपनी पसंद के पुरुष का साथ लेने के लिए किसी दूसरे से पूछना पड़ेगा? स्वतंत्र देश में भी उसे अपना जीवन जीने के लिए दस लोगों की पसंद-नापसंद का खयाल रखना पड़ेगा। क्यों? कब तक?मीत की बातों में मुझे फिल्ममेकर अर्पणा सेन याद दिला दी, उन्होंने भी कभी इसी तरह के वाक्य बोले थे और मीडिया को स्तंभ होकर उनकी दलीलें सुननी पड़ी थी..
मुझे मीत की बातों ने आश्चर्य में डाल दिया, जो लड़का इतना पॉजेसिव था, वह नारी-स्वतंत्रता, उनके अधिकारों की बात कर रहा है। जब बात बच्चे (संतान) पर आई, तो मीत का नजरिया बिल्कुल क्रिस्टल क्लीयर नजर आया। उसका कहना है कि आप एक साल के भीतर एक बच्चे का बाप बन जाते हैं और समाज इसे हमारी मर्दानगी कहता है। धिक्कार है मुझे ऐसे मर्द बनने पर जो एक बच्चे के भविष्य को आंक न पाए। मर्दानगी के नाम पर अपने कमजोर कंधों से उसे थामे रहे आंतिम सांसों तक। आखिर हम को अपनी धारण क्षमता का भी आभास होना चाहिए
उसकी बातों में मुझे युवा ह्यूगो शावेज की झलक दिखाई दी। इतनी बड़ी चिंगारी है इसमें।
मीत की कहना स्पष्ट है कि जिस दिन पत्नी और मैं ये महसूस करेंगे कि हम एक बच्चे को अच्छी नींव दे सकेंगे, तभी पेरेंट्स बनने की कोशिश करेंगे। अगर कभी महसूस हुआ किसी अनाथ बच्चे को हमारे साथ की अधिक जरूरत है, तो उसे बतौर अपनी संतान अपना लेंगे....
आखिर ऐसा क्या हुआ? मीत इतना बदला कैसे? मैंने काफी सोचा है, शायद आप भी सोच रहे होंगे।
मेरा मानना है कि मीत ने जिंदगी जीने के सार को समझा है कहने का मतलब उसने पहचान लिया है जिंदगी का *सोम-रस*
मीत के विचारों से पेरेंट्स खफा हैं। होंगे भी क्योंकि वे उसे पुरानी जीर्ण-विचारधारा को लादे रहने को अपनी मर्यादा समझते रहे हैं।
जो गलती उन्होंने की या कहूं सामाजिक दबाव की वजह से दोहराई, उसे अपने बेटे और बहू के जरिए जी लेना चाहते हैं, क्योंकि वे अब भी जिन्दगी की सरल बातों को आत्मसात करने से दूर हैं। जबकि उनके जैसे करोड़ों माता-पिता अपनी सारी जिंदगी खिटपिट में, जीने की जद्दोजहद में बिता रहे होते हैं, मगर खुशियां रूपी सोम-रस को चखने से वंचित रहते हैं। कोई उनके हाथ बांढ कर नहीं रखता, वे तो उन अदृश्य शक्तियों से बंधे हैं, जो उन्होंने खुद के अहंकार को पोषण देने के लिए बनाई हैं।
अब अपने जवान बच्चों के साथ ऐसा सलूक क्यों? उन्हें जिंदगी का सोम-रस पीने दीजिए, क्या पता जिंदगी की रेशमी डोर कब टूट जाए।

इतनी सरल बात को मीत ने समझा, क्योंकि समझने के लिए एक गुस्ताख दिल की जरूरत पड़ती है और अगर मेरा यकींन करें, तो एक सच्चा मर्द ही ऐसी गुस्ताखियां कर सकता है...







Saturday, January 10, 2009


आपके जीवन में घुलता रहे सोम-रस
हर पल रक्त से भी तेज
धमनियों में धड़कता रहे सोम-रस...
खुशबू की बयार लिए
सांसों में महकता रहे सोम-रस...
निम्न से उच्च स्वर तक
कानों में बजता रहे सोम-रस...
जीवन के हर उल्लास पर
खुशियों में तौलता रहे सोम-रस...






Tuesday, January 6, 2009


Saturday, January 3, 2009

संकल्प का रहस्य..




मेरे लिए अब-नया साल कोई खास मायने नहीं रखता है, क्यूंकि काफी साल पहले ये संकल्प लिया था –हर दिन मेरी नयी शुरुआत होगी, हर दिन साल के पहले दिन की तरह ऊर्जा और नए उत्साह के साथ बीतेगा इसीलिए नया साल बस दोस्तों और दुश्मनों को हैप्पी न्यू इयर विश करने की औपचारिकता बन गया है
पुराने साल का अन्तिम दिन संकल्प या रेजोलुशन लेने ले लिए होता है..सो मैं भी करती हूँ..मगर in a diferent way आप सोच रहे होंगे–What is that different way?
अरे बाबा! मैं एक कोरे पन्ने पर अपने संकल्प लिखती हूँ और उन्हें न्यू इयर eve पर सिरहाने रख कर सो जाती हूँ
ये सोच कर की ये कागज़ का टुकरा मुझसे मेरे संकल्प कराता रहेगा- ठीक उसी तरह जैसे mazdoor की मांगों पर प्रबंधन “कुछ तो करना है कर डालो वरना ये काम ठप्प कर देगा”और वो छोटा सा कागज़ का टुकडा वाकई कमाल करने लगता है और मुझे भी ट्रैक से आउट नही होने देता है। सबसे अहम् बात -मैं भी उसे किसीके हाथ पड़ने नही देती॥
आप सोच रहें होंगे-ये चिटठा गले में ताबीज बना कर पहन लेती होगी.. नही ऐसा नहीं करती. बल्कि, मैं तो संकल्प लिखे कागज़ को पहले प्यार से चारों तरफ़ से चिपका कर अंग्रेज़ी कैलेंडर की पहली तारीख को ऐसी जगह रख देती हूँ, जहाँ मेरा ध्यान रोज़ जाता है. मसलन तिजोरी में, या फिर गुल्लक के पास , नही तो मेरे आराद्य के समीप… और संकल्प का चिटठा अपने आप काम करवाने लगता है..और ये सिलसिला कई सलून से जरी है,इसने अच्छे परिणाम दिये है..पहले-पहले मेरी वोही हालत ही- संकल्प लेती और 24 घंटे के भीतर मेरा ब्रेन जवाब दे देता की आप रेजोलुशन भूल चुकीं हैं..मगर systemic remembrance से मेरे संकल्प रंग ला रहे हैं.. मुझे ख़ुद पर हैरानी होती है की 80-90% तक संकल्प पूरे किए हैं मैंने..सिर्फ़ वे काम ही अटके हैं, जो मेरी पहुँच के बहुत बाहर थे..

ये मेरे जीवन की छोटी सी बात है जो आपसे शेयर करना चाहती थी, आप भी आजमा कर देखना क्यूंकि.

इस छोटे से लेख में जीवन का रस छुपा हुआ है, जो मेरे लिए सोम-रस साबित हुआ है। मैं चाहती हूँ कि ये आपके जीवन में भी सोम-रस घोल दे, क्यूंकि इसके पीछे छुपा है विज्ञान का रहस्य
पहली बात 24 घंटों के बाद हम सिर्फ़ 18% ही याद रख पाते है और व्यवस्थित दोहरान वाली प्रक्रिया से उसी बात को या विषय को स्मृति में पुख्ता करते जाते हैं...

..दूसरी बात नियंत्रण में नहीं होता, मगर संगृहीत सूचनायों को लगातार किसी भी माध्यम से पाकर हमारे व्यवहार को उसी दिशा में मोड़ देता है...