Saturday, February 28, 2009

Dog in slum!


An object of adulation for millions, 10 year-old Azharuddin Ismail’s stardom doesn’t appear to cut much ice back at home with his father, you can say that reality slapped harder...Even at glitzy film fare award Function, he been deprived off...
His dreams in open eyes at Oscar ceremony..and now the TURN seems to say that time is a real director...

















Thursday, February 26, 2009

भगवान परेशान है !


मैं भी खूब डोलती फिरती हूं। इस बार जाने किस अजनबी जगह चली गई..पता नहीं। पता चलेगा भी कैसे?जात से जो पत्रकार हूं...पूछताछ को कोई मिला नहीं, सो इधर-उधर तांक-झांक करके स्थान विशेष का पता लगाने की कोशिश करने लगी। जब लगा कि डैडलाइन सिर के ऊपर से गुजर रही है, तो दिमाग ने तेजी से चक्कर खाना शुरू किया और मैं एडिटर(मौत से कम नहीं) के न्यूज मांगने के स्टाइल से गश खाकर चित्त हो गई...

आवाज आई..लगता है गई काम से...चलो देखें इस बेचारी को (आजकल बेचारी शब्द महिला पत्रकार के लिए विशेष रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है) मुझे होश था कि नहीं..मगर आवाज सुनाई दे रही थी...

कोई पुरुष की आवाज है..कह रहा था.. लगता है चुराने आई है..अब बचा ही क्या है?इससे पहले तो अन्न का संकट आया तो तुम्हारे द्वार तक पहुंचा और तुम तो अन्नपूर्णा बन गई और मै तो फकीर ही रहा..
आज जो तुम्हारी बदौलत भी रहा है वो ये लोग अपना समझ कर कब खिसका लेते है
अब देखो एक मेरा ही परिवार ब्रह्माण्ड में सबसे अधिक पूजा जाता है .... और मेरी ही हालत सबसे .....

मुझे लगा कि आवाज जानी-पहचानी है..इस बंदे को कहीं देखा है मैंने..
समझ में तो कुछ रहा था..मैं भी न्यूज की खोज में बेहोशी से निकलने का नाटक करती रही (पत्रकार अभिनय करने में माहिर होते हैं)..फिर आवाज सुनाई दी..

कपड़ों की स्टाइल और खाता-पत्र देखकर लग रहा है कोई कामकाजी है...शायद रिपोर्टर...पर ये यहां किस काम से चली आई...

दूसरी ओर से किसी स्त्री ने कहा-हमारे यहां ऐसा क्या है..जो चोरी हो सकता है? लगता है एडवांस खबर हाथ लग गयी है..
(मुझे हंसी गई क्योंकि रिपोर्टर का काम भी पोर्टर की तरह ही है..यहां से माल उठाओ और वहां पर माल जमाओ..

पुरुष कुछ कहता इससे पहले मेरी नींद खुल गई..मां की आवाज सुनाई दी..सोती है तो घोड़ा बेचकर..कितनी देर से मोबाइल बज रहा है...उठाएगा कौन?
मेरी आंखें खुली और सामने कलैडर पर बाबा भोले का भस्म लगाया फोटो मुस्कुराता दिखा..
करवट बदली तो पापा अखबार में पढ़ रहे थे..इस बार भी भगवान को लूट लिया बदमाशों ने।

अब आप ही बताएं हमलोग लुट-पिट रहे है, तो भगवान क्यों लूटे जाएं। वैसे भी भगवान को चढ़ावा-भेंट चढ़ा-चढ़ा कर उन्हें मालदार बनाने में हम ही तो आगे रहते है। सोचते है पाप धुल गए और पुण्य कमा लिया। धीरे-धीरे चढ़ावे की दानपेटी भगवान की सेवा में उपस्थित रहने वालों के आंख की किरकिरी बन जाती है और आपसी रंजिश में भगवान के गहने-कपड़े तक उतर जाते है।

हम धार्मिक रिपोर्टिंग करने वालों को भी काम मिल जाता है। अखबार में `भगवान परेशान हैं´ की खबर फोटो सहित छपती है और पाठकों तक पहुंचती है। पाठक फोटो में भगवान की दीन अवस्था देकर द्रवित हो उठता है और फिर संकल्प लेता है चढ़ावे में कुछ भारी चढ़ाऊंगा...
और इस तरह भगवान के घर में आता रहेगा...और जाता भी रहेगा
....वैसे भी भगवान् को चोर-उच्चकों से जितना डर-भय नहीं है. उतना तो वे अपने मालदार (सभी प्रकार के) भक्तों से परेशान है, भगवान् के घर बुद्धि बटने के समय तो सब मेरी तरह घोड़ा बेच कर सो रहे थे अब इतना नहीं समझते कि भगवान के नाम पर किसी अनाथ बच्चे को पढ़ाने का जिम्मा उठा लिया जाए, तो भगवान की परेशानी भी कम होगी
जरा आप और मैं मिलकर सोचें किसी की गलती का शिकार अनाथ बच्चा क्यों हो, उसे भी मोटा खाने-पहनने का अधिकार है. अगर वो सुविधा संपन्न नहीं है तो क्या हम उसकी जरा सी मदद नहीं कर सकते?
आखिर घाट घाट में भगवान् समाये रहते है फिर हमारे हाथ क्यों दान-पेटी तक सिमट जाते हैं?

Saturday, February 21, 2009

निशा सुसान का पिंक एलिफेंट

हिन्दुस्तान टाइम्स में chaddi kissa continues ...पर नजर पड़ गई, तो बहुत पुरानी बात याद आ गई। कोलकाता का सबसे पहला डिस्कोथेक का नाम था पिंक एलिफेंट...उस नाइटक्लब के बारे में पापा के मुंह से काफी कुछ सुना है ( पापा मेरे बहुत जिंदादिल और रंगीन इंसान रहे हैं) पापा ने बहुत सारे किस्से बताए थे कि एंग्लो-इंडियन्स के संस्कारों को भारतीय पुरुषों ने शिरोधार्य कर लिया था और अपनी निशा(ओं) को पिंक एलिफेंट में जाकर रंगीन किया था। ऐसी कई घटनाएँ हुई थी जब चौरंगी रोड (आज का जवाहरलाल नेहरू रोड, कोलकाता)पर संभ्रात घर की महिलाएं छीटाकसी का शिकार हुई थी। खैर, ये बात पापा के जेहन में आजतक अंकित है, क्योंकि अपनों पर छीटाकसी होने का दर्द भी झेला उन्होंने
अब पिंक एलिफेंट बंद हो चुका है मगर निशा ने उन बातों को याद कराया है




जब पहली बार मैं डिस्कोथेक जाने वाली थी, तो उन्होंने ही कहा था कि ये ऐसी जगह है जहां आप ख्याति से अधिक कुख्यात होने के चांसेज रहते हैं। आधुनिक होना बुरा नहीं है, मगर इस स्टेटस को झेल पाना थोड़ा टेढ़ा है, इसलिए आफ्टर इफैक्ट्स के लिए तैयार रहना। उन्होंने परंपरावादी और संस्कार वाले परिवार का सदस्य होकर ऐसी जगहों में सेंध लगाई थी, मगर हम बच्चों के लिए उन्होंने प्रोटेक्टिव और डिसिप्लनेरियन व्यक्तिकत्व हमेशा सामने रखा था।
आज निशा सुसान जिस टैरेटरी में सेंध लगा चुकी हैं, वो सियासती दांव-पेंचों में चलती है। हिन्दुस्तान टाइम्स में chaddi kissa continues .. शीर्षक से छपे उनके वक्तव्य से समझ में आ रहा है कि वे अपनी पिंक चड्डी कैम्पेन का ऑफ्टर इफैक्ट्स भुगतने जा रही हैं, निशा सुसान को लोग फोन करके परेशान कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके मोबाइल नम्बर पर वेलेंटाइन के दुश्मनों के फोन आ रहे हैं और वे अभद्र आचरण वाली बातें कर रहे हैं....अपना मोबाइल नम्बर आपने ही वेबसाइट्स और की झोली में डाला था, तब भूल गई थी -न्यूटन का थर्ड लॉ-

''every action has opposite and equal reaction ''

अफसोस अब मैडम करेंगे ही, जो चंद रुपयों और शराब-शबाब के लिए नेताओं की जागीर चलाते हैं, उन्हें आप से और सामान्य जन से क्या मतलब। वो तो ऐसे लोग हैं, जो अपनी बहू-बेटियों को नहीं छोड़ते। फर्क इतना है कि बाहुबल की वजह से ये चीखें चाहरदीवारी में दफन हो जाती है।

साथ आपके ऐसी गर्ल्स शिकार होंगी (या हो रही हैं) जो पिंक चड्डी कैम्पेन की जानकारी से कोसों दूर हैं। रही बात आपको परेशान करने की वो भी मिडिया के जरिये मतलब गर्ल्स के जेहन में डर पैदा करना...क्यूंकि आपका पिंक चड्डी कैम्पेन पिंक पॉलिटिक्स से जुड़ गया है

आज जो भी निशा कर रही हैं, वे किसके लिए कर रही हैं समाज की कौन से वर्ग की महिलाओं के लिए। वैसे भी पब कल्चर शहरों में मेट्रोज में ही हवा पा रहा है, जहां वर्किंग वुमन और कॉलेज गर्ल्स को किसी एक दिन वेलेंटाइन मनाने की जरूरत नहीं है, वे तो 365 दिन वेलेंटाइन की खुशियां मनाती हैं। रही बात छोटे शहरों की तो वहां भी ऐसे कैम्पेन की जरूरत नहीं हैं, क्योंकि जो काम शहरों की महिलाएं खुलेआम करने की जहमत उठा लेती हैं, वहीं काम छोटे तबकों की महिलाएं चुपचाप कर लेती हैं। उन्हें भी वेलेंटाइन मनाना आता है मैडम, प्रकृति हो या पुरुष उन्हें रास्ता निकालना आता है। आपके इस कैम्पेन की बदौलत गर्ल्स (महिलाएं) होजरी शॉप्स पर अपने अंडर गारमेंट्स तक खरीदने से पहले झेपेंगी । उसपे ये फागुन आग लगायेगा ...मौसम में यू भी भंवरे बौरां रहे हैं.. होली में प्रेम-मिलन के मौके पर अनजाने में कितनी गर्ल्स इस कैम्पेन की भेंटे चढ़ेगीं ..ये तो आपने हिसाब लगा लिया होगा ?

बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है मैडम, वैसे ये फ़ोन काल्स को आप प्यार के साइड इफैक्ट्स मान लीजिए, जी छोटा मत कीजिए गर्ल्स के लिए और भी मुद्दे है जिनपर काम किया जा सकता है,

अगर आपको आपनी प्रतिभा जाया करने का शौक है तो ठीक है
it haunts you and so me .....

चलते-चलते आपके कारनामे से मुझे पापा की बातें फिर एक बार याद आ गयी

आफ्टर इफैक्ट्स के लिए तैयार रहना।



Wednesday, February 18, 2009

शर्मिंदगी है या सम्मान

कुछ लोग हैं, जिनके दिमाग में
कुछ न कुछ कुलबुलाता रहता है
वे सोते-जागते सोचते हैं,
उन्हें परिवर्तित समाज चाहिए।
आजाद हवा चाहिए और
साफ आसमां चाहिए।
वे सोते-जागते सोचते हैं
कि पहल तो मेरे परिवार से आए,
करते भी हैं शुरुआत दम से
अपनी आइडेंटिटी के बल से।
क्योंकि उन्हें परिवर्तित समाज चाहिए।
मगर ये दकियानूसी क्यों
जो सम्मान तुम्हें क्षमताओं ने दिया है
उसे शर्मिंदगी क्यों समझने लगे।
जिसने तुमको आइडेंटिटी दी,
उसे क्यों बदलने लगे?
क्योंकि तुम्हें परिवर्तित समाज चाहिए।
इसलिए पिंक होने के लिए पिंट में डूबे रहते हैं
पिंक और पिंट के बीच का दायरा तो समझो,
न समझ में आए, तो न बदलने की जहमत करो
न बदलेगा समाज, और न बदलेगी जिंदगानी
पिंक और पिंट के बीच खप जाएगी जवानी
क्योंकि परिवर्तित समाज के लिए
क्षमताओं को परखने की जरुरत है

फिर न रहेगी शर्मिंदगी
ना सम्मान ही याद आएगा।

समय ने बदला है समाज,
समय के साथ ही बदल जाएगा

Saturday, February 14, 2009

डीएनए में लव का कीड़ा

वेलेंटाइन डे ऐसे बीतता दिखा जैसे भगवान के सैनिकों ने गुलशन में सचमुच डर बिखेर दिया हो, रास्ते सूनसान, पार्को में ताले, मगर प्राइवेट पिकनिट स्पॉट्स गुल गुलशन गुलफाम रहे। इन्हें किसी दल का डर नहीं था, इन्हें डर था तो अपने इजहार-ए-मोहब्बत के तरीके का, जो मैनुपुलेटिव रहा है, हर इजहार से पहले और बाद में मैनुपुलेटिव रहा है... इसे हम और आप शायद गलत कह लें, मगर ये ईश्क फरमाने का तरीका उनके डीएनए में है। उन उन्हें किसी पिंक या ब्लू चड्डी कैम्पेन की जरूरत नहीं है, उन्हें हर हाल में अपने दिल से राह तलाशना आता है...

महसूस तो तब होता है दर्द जब वेलेंटाइन का असली चेहरा नज़र आता है ...उन्हें दोष देने का कोई फायदा नहीं , उनके डीएनए में लव का कीड़ा होता है

spirit of Love

You will find as you look back upon your life that the moments when you really lived are the moments when you have done things in the spirit of Love because लव is that condition in which The happiness of another person is essential to your own inner-core

Thursday, February 12, 2009

तेज की सेज

ब्लोगर्स के दो दिग्गज आपस में जा भिडे है, दोनों की गतिविधयों को स्टडी के बाद मैंने काफी कुछ सीखा, जो आपसे शेयर करने जा रही हूँ...
इस लडाई को मैंने तेज की लडाई कही थी, क्यूंकि इसमे रचनात्मक अंहकार के अलावा जानने के लिए बहुत कुछ मुझे दिखा है लड़ाई में कोई भी जीते कोई भी हारे, नुकसान उनका होगा जो इस लड़ाई से कुछ नहीं सीखेंगे ....मैंने जो सीखने लायक समझा वो शायद मेरे साथ आपके काम भी आएगा, ऐसा मेरा मानना है...गौर करें
स्ट्रैटजी-तेज की लड़ाई में जीत उस ग्रुप के करीब होती है, जो तेज को बढ़ाने के साथ उसे भुनाने की स्ट्रैटजी भी अपनाता रहता है यानी दूरदर्शिताके साथ लीडरशिप मेनटेन करने का ज'बा। ताकि विषम परिस्थितियों में आप उतने ही क्रेडिबल बने रहें, जितने शुरुआत के समय थे।
ब्रांडिंग-किसी भी काम को लोगों के दिलो-दिमाग पर अंकित करने के लिए एक ऐसे नाम की जरूरत पड़ती है, जो सरल हो और दिमाग में आते ही कुछ करने को प्रेरित करे। ऐसे नामकरण की बदौलत ब्लॉग की ब्रांडिंग करने में आसानी होती है। ब्लॉगर्स उसकी ओर चुंबकीय गति से आने लगते हैं।
मार्केटिंग-सफल स्ट्रैटजिस्ट मार्केटिंग करना नहीं भूलता है। अगर वह एग्रेसिव मार्के¨टग हो, तो सफलता का प्रतिशत बढ़ जाता है। ये जरूरी नहीं है कि टीम को मार्केटिंग के बारे में बताया जाए। ब्लॉग्स को एग्रेसिव मार्के¨टग के जरिए लोगों के जुबान पर चढ़ने के लिए आसानी से सामने लाया जाता है। वहां हर बात को कुछ ऐसे ढंग या शब्दों से सामने लाया जाता है, जिससे सुनने-समझने वाले के दिमाग का रसायन फफक उठे, और वह रिएक्ट करने के लिए मजबूर हो।
स्ट्रेंथ -जब ग्रुप में आप बढ़ते हैं, तब अपने साथियों की स्ट्रेंथ परखते रहना उतना ही जरूरी है, जितना खुद की स्ट्रेंथ, क्योंकि जैसे-जैसे सफलता मिलने लगती है, साथियों के विचारों में उतना ही तर्क दिखायी देने लगता है। जो साथी टीमवर्क में विश्वास रखते हैं, वे अन्तत: कोशिश करके ग्रुप के साथ चलते रहते हैं, भले ही लंगड़ाते हुए। टीम वर्क की भावना का पोषण करने वाले अगर लीडरशिप की भावना में आ जाते हैं, तो उनके लिए ब्लॉग की टीम से निकलना ही श्रेयस्कर होता है।
ग्रिप -अब आई बात ग्रिपिंग की, टीम को थामे रखना भी किसी कौशल से कम नहीं है। ऐसे समय में आपकी लीडरशिप और अन्य कौशल को अगर कोई चैलेंज करे, तब अन्य लोगों का आपके सपोर्ट में आना या खड़ा होना ये दर्शाता है कि आप कितने सही या गलत हैं।
दो दिग्गजों ( ग्रुप) की लड़ाई में मेरे छोटे से दिमाग ने काफी कुछ सीखने की कोशिश की।मेरे अनुभवों की आंखों से ये कुछ ऐसी बातें हैं, जो किसी भी छोटी शुरुआत को खुला आसमान दे सकती हैं। अगर ये बातें निजी जिंदगी में भी अपनाई जाएं, तो सक्सेसफुल होने के चांसेज बढ़ जाते हैं।