Thursday, May 5, 2011

अब्दुला दीवाना

बहुत दिन बीते
मैं नींद में खोई थी
ना जागी थी और ना मैं सोई थी
कितनों को देखा मैंने,
पलकों के अधर तले
पर ना पाया मैंने अपने जो संग चले
बहुत दिन बीते
मैं खील-खील हो रोई थी
न जाने किस बगिया में सोई थी



दिन बीते रात बीते
हवाओं के साथ रीते
कोपलें फूट चुकी कब क़ी
न जाने क्यों मैं खोई थी
तंद्रा थी ऐसी जो
मुझे कुरेदती गई
आसमां से जमीं तक टोहती रही
लेकर क्या है जाना,
सारा ·कुछ है बेगाना
उसके इस शहर में तुम भी हो
अब्दुला दीवाना
बहुत दिन बीते
मैं नींद में ही खोई थी
पर थोड़ी-थोड़ी जागी थी और
थोड़ी-थोड़ी सोई थी....

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

अपना उनको कह भी लेते,
उनके नखड़े सह भी लेते,
यदि उठ जाती एक पल को भी,
आँखें उनकी चाह भरी।

अमित पुरोहित said...

abdulaah ke bahane amitabh se bhee mile... allaah kare zore kalam or bhi jiyadaa... aamin

sportscrop said...

i like it....