Friday, October 8, 2010

परम सत्ता को नमन !


मेरे बंधू ने एक प्यारी सी ई-मेल भेजी थी, जिस के चित्रों ने कहानी कही है, आप भी उस शक्ति को नमन करें, नवरात्रों क़ी शुभकामनायें.....

....पर मेरी एक बात पर भी गौर कर लें...


नवरातों में नौ दिनों तक हम ब्रह्मांड को संभालने वाली परम सत्ता की अराधना में लगे रहते हैं, क्या इन नौ दिनों में हम 'उस परम सत्ता के बारे में क्षण भर के लिए भी सोचते हैं जिसने हमारे जीवन के ब्रह्मांड को संभाल रखा है, सजा रखा है अपने आंचल से।

वो आंचल जो कभी छुटपन में हमारे मुख पर लगे जूठन को साफ कर देता था, आज भी कभी खाने की थाली पर मक्खी भिनभिनाने लगे, तो वही आंचल उसे भगाने के लिए आगे जाता है।


जिसका आंचल हमें सारी विपदों से बचाता है, हम उस परम सत्ता की अराधना नहीं करते, हम करते हैं पत्थरों पर बसने वाली परम शक्ति का, पर जिस हांड़-मांस की पुतली 'मां ने हमें पहला घर दिया है,

उसकी अवहेलना... क्यों?

क्या घर में बसी मातृसत्ता उस परम सत्ता से अलग है या कमतर है।

क्या सोच कर उस सत्ता को तकलीफ देते हैं?


क्या हम उस सत्ता से भी खुद को बड़ा आंकने लगे हैं?

हम किस दुश्मनी का बदला ले रहे है?

अगर वो सत्ता न होती तो आज हम अशरीरी कहीं भटक रहे होते.. कभी इसकी छत , तो कभी उसके बुर्ज

साल मेरे दो बार नवरातें आतीं हैं, तब तो गला-पहाड़ कर माँ के जयकारें
लगाते हैं...और घर की देवी को रुलाते हैं



ये याद भी नहीं रखते क़ि सारे कर्ज चुक जायेंगे, मातृ-कर्ज कैसे चुकायेंगे ?

... और मौन होकर ऐसे निर्णय ले लेते हैं जिनसे हमें भी सुख नहीं मिलता..

उस परम सत्ता की वजह ही आज हमारा वजूद कायम है ... वर्ना इस सुंदर संसार का
उपभोग करने वालों में हमारा नामो-निशान न होता



उस परम पुंज के अंश को अँधेरे में रख कर हम कौन सा प्रकाश पा लेते हैं ?


इतना कुछ करने के बाद भी वो दयामयी ही बनी रहती हैं


क्या हम इन नौ दिनों में कम से कम एक दिन तो अपनी मातृसत्ता की पूजा-अर्चना करने का वक्त निकाल ही सकते हैं?





एक दिन ठीक उसी तरह उस जीवित सत्ता के चरणों में बैठ कर अर्चना करना, जैसे क़ि नवरात्रों में निर्जीव तस्वीर के आगे भीख मांगते हो, पुष्पों से माँ को लादते हो ....

कर के देखना.. जिंदगी का नजरिया बदल जाए...





और यकीनन जिदंगी खूबसूरत हो उठेगी।







5 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी सुन्दर चित्र-पोस्ट।

राममोहन said...

bahut hi sundar

Anand Rathore said...

bhav bhi.. siksha bhi... pyar bhi.. dukh bhi ..sab kahti hain ye tasviren..bahut sunder

Rajey Sha said...

कमेंटस बॉक्‍स के अलग खुलने की कन्‍फयूजन से ही शायद आपकी श्रेष्‍ठ संकलन पर ज्‍यादा कमेंट नहीं दि‍ख रहे हैं।

ujjwal subhash said...

Jay Hind,

Bahut marmik or samkaleen subject or utna hi vyapak focus......or bhawon ki gehrayee.....bahut sunder

mubark ho