Tuesday, January 19, 2010

माँ ! अमर कर दो



इस गहन तिमिर में माँ
मेरा मन उज्जवल कर दो
तेरी तरह मुझ पर नूर बरसे
ये वर दे मुझ को अमर कर दो
-somadri

Sunday, January 17, 2010

लाल सलाम !

8 July 1914 – 17 January 2010

चेहरे पर वही गाम्भीर्य भाव लिए वो चला गया...
अपनी सोच और परखने की क्षमता के बल पर
किसी को कॉमरेड का सच्चा अर्थ बता गया...


आज मेरी लेखनी इस शलाघा पुरुष के विषय में लिखने के लिए खुद को अक्षम पा रही है...
कम्युनिज्म प्रति मेरे खिंचाव, उस सोच को परखने में ज्योतिदा के व्यक्तित्व का योगदान रहा है।

कोलकाता में बिताए मेरे यादों के खजाने से ऐसी कई यादें हैं, जो उनके व्यक्तित्व के दूसरे पहलुओं से रूबरू करा गई मुझे....

एक बात सच है कि आप जब तक अपने पुराने ढर्रे के विचारों से आजाद नहीं होंगे, तब तक आधुनिक नहीं हो सकते... ये लाइनें कोलकाता के ब्रिगेड मैदान में रैली को संबोधित करते हुए ज्योतिदा ने कहे थे, मैं भीड़ से दूर पारसी क्लब की क्रिकेट पिच पर अभ्यास कर रही थी। खेल-खेल में इन लाइनों ने मुझे रुढ़िवादी बालिका से हर बात को तर्क की कसौटी पर कसने वाली में रूपान्तरित कर दिया।

जो शब्द सुने, उन्हें आत्मसात करने का प्रयत्न आज भी जारी है...

कॉमरेड ज्योति बसु को मेरा
आखिरी लाल सलाम


Friday, January 8, 2010

बहुत कष्ट होता है !



किसी व्यक्ति से मोह हो जाए, किसी पेड़ के प्रति स्नेह हो जाए, तो बात समझ में भी आती है, पर कंक्रीट की चाहरदीवारी से मोह हो जाए, बड़ा अटपटा लगता है। वो भी संक्षिप्त कुछ दिनों में। मैं सोचती हूं जरूर मेरा होरमोनल सिस्टम काम नहीं कर रहा होगा कि पत्रकारिता के तेवर वाली महिला ऐसे चक्करों में पड़ गई, क्योंकि जिस मकान में तीन सालों तक रेंट पर रही, उसे छोड़ते समय भी मुझे कष्ट नहीं हुआ था। पर इस घर को छोड़ते समय मेरे दिल ने बहुत लगाव महसूस किया। शायद शरीर त्यागते समय आत्मा को कितना कष्ट होता होगा। इसकी एक झलक मुझे दिखाई दे गई थी।
आप सोच रहे होंगे मेरे साथ कोई एçक्सडेंट हुआ होगा इस घर में और मुझे पोस्ट डैथ सिचुएशन नजर आई होगी।...
नहीं जनाब ऐसा कुछ भी नहीं है। हाल में मुझे पॉश इलाके में रहने लायक जगह मिल गई और मुझे आनन-फानन में पुराने मकान से विदा होना पड़ा। अधिक माल-असबाब भी नहीं था, तो क्विक मामला रहा। पर ये गौर करने वाली बात रही कि एक साधारण से मकान से विदा लेते वक्त ऐसा लगा, जैसा कितना कुछ छूट रहा है यहां। ये भी , वो भी ले लूं...मगर वहां ऐसा कुछ भी नहीं था, जो मैं वास्तव में छोड़ कर जा रही थी।

सोचती हूं कि जब एक कंक्रीट से बने घर को छोड़ते समय मुझे इतना कष्ट हुआ, तो जब शरीर त्यागने की बारी आएगी, तो मैं क्या-क्या समेटते हुए चलूंगी, जबकि ये सत्य झुठलाया नहीं जा सकता है कि आप खाली हाथ आते हैं और खाली हाथ ही जाते हैं...
दूसरा भी सबसे बड़ा सत्य है कि हम ताउम्र रेंट के मकान में ही रहते हैं। मकान तो सिर्फ एक बार ही नसीब होता है हम सभी को, जब हम मां की कोख में रहते हैं...उसके बाद मकान की तलाश अगले जन्म तक जारी रहती है...इन मकानों को छोड़ने और पाने के मसलसल सफर में आत्मा को कितना कष्ट होता है..ये राज मैंने जान लिया..

Friday, January 1, 2010

लौट आयें ही हम!

laut aaye hain haum,
naye saal me kuch purani yadon ke saath
naye utsah se labrez ho kar
laut aaye hain hum....