Tuesday, January 27, 2009

देश-भक्ति कभी खोएगी नहीं


गणतंत्र की जय हो

जब भी देश-भक्ति की बात होती है, कवि प्रदीप के लिखे अमर गीत की पंक्तियां याद आने लगती है मुझे...

आज के इंसान को ये क्या हो गया?

इसका पुराना प्यार कहां पर खो गया?


मुझे नहीं लगता है कि भारत जैसे देश में लोगों के बीच प्यार खोता जा रहा है, हो सकता है कि हम आतंकवाद, जातिवाद, राष्ट्रवाद और न जाने कितने वाद-विवादों से घिरे थे, घिरे हैं और घिरे रहेंगे, मगर एक बात इन्हीं वाद-विवादों के बीच से हमें एक-दूसरे से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करती है... और वह है तिरंगा....
जिस तरह तिरंगे को लहराता देख मेरा मन एक अजीब से अहसास से झूमने लगता है, उसी तरह हर वो भारतीय आंखें तिरंगे के तीनों रंगों को देख कर शहादत करने वालों को एक बार तो याद करती होगी..उन आंखों के सामने एक बार उन बम-धमाकों के धुएं में चलती-फिरती, भागती-दौड़ती वो तस्वीरें दिखाई देती होंगी, जिन्होंने आतंकवाद के दंश को प्रत्यक्ष झेला है...और वो आंखें भी देशप्रेम से भर जाती होंगी, जिन्होंने मीडिया की नजर से उन्हें देखा है, भले ही ये अप्रत्यक्ष दृश्य हो, मगर इसने भी उतने ही घाव दिए हैं, जितने प्रत्यक्ष साक्ष्य वालों ने लिए हैं....हम भले आतंकवाद के बारे में सोचते हों-

कैसा ये खतरे का फजल है,
आज हवाओं में भी जहर है...



मगर मुझे महसूस होता है कि इस फजल ने भी हमें दिलों से, संवेदनाओं से जोड़कर रखने में मदद की है। जब भी हम अपने जवानों के शरीर पर तिरंगा लिपटा हुआ देखते हैं, उस समय एक बार देश को तहस-नहस करने वालों को मिटाने अपनी मुटि्ठयां भींच लेते हैं। और वो जहरीले लोग यही सोच-सोच कर खुश होते हैं कि इस देश को तो...
डस दिया सारे देश को जहरीले नागों ने, घर को लगा दी आग घर के चिरागों ने...
उन्हें ये सोच कर अंदर ही अंदर मरने दें हम, क्योंकि हम उस देश के वासी हैं जिसने संसार को शून्य दिया है और ये शून्य अपने आप में बहुत घहरा अर्थ समेटे हुए हैं। शून्य यानी ब्रह्माण्ड , हमारे अंदर का ब्रह्माण्ड , हमारे बाहर का ब्रह्माण्ड ... और उस तिरंगे का चक्र(अशोक चक्र) जिसमें एक नही, २४ तिलिया है. ये हमें २४ प्रहार देश-प्रेम की याद दिलाती रहती है वो भी अनजाने में...एक संदेश के जरिये ...

सुनो जरा ओ सुनने वालों,
आसमान पर नजर घुमा लो
एक गगन में करोड़ों तारे,
रहते हैं हिल-मिल कर सारे...


फिर हम क्यों डरते है ऐसी अप्रत्याक्षित बातो से, क्या हम ये सोचते है कि....
किसके सिर इल्जाम धरें हम,
आज कहां फरियाद करें हम,
करते हैं जो आज लड़ाई,
सब के सब हैं अपने ही भाई...


देखिए हर दिल अगर ये फरियाद खुद से कर लें, तो देश-भक्ति कभी खोएगी नहीं, यकींन मानिए यह लहराएगी तिरंगे के रंगों में, जल में, थल में और गगन में ..एक बार फिर से कवि प्रदीप की आत्मा सदा देगी

अपना तो वो देश है भाई,
लाखों बार मुसीबत आई...
इंसानों ने जान गंवाई
पर देश की लाज बचाई॥
हिन्द

4 comments:

Anonymous said...

बहुत खूब लिखा है आपने..- कस्तूरी

संगीता पुरी said...

धन्‍यवाद .. पढकर नाज हुआ अपने देश पर !!

Sanjeet Tripathi said...
This comment has been removed by the author.
Anonymous said...
This comment has been removed by a blog administrator.